शनिवार, ११ जून, २०११

दत्ता म्हणे

             ।।भारूड।।
जाणा खोटा रे खोटा। नाही गुरूचा बेटा।।धृ।।
गर्वात राही सिद्धि मिळुनी। मुखी बोले ते होई जाण।
स्वये कामात राही लोळुन। लोका शिकवी ब्रह्मज्ञान।।
कुंडलिनीस जागवुन। ब्रह्मरंध्रा नेली जाण।
स्वये वासना अधिन। राहे वैराग्य भासवुन।।
प्राणीमात्रा भेद करून। नाही ओळखे नारायण।
उच्च नीच भाव ठेऊन। तिरस्कारले सारे जन।।
साही शास्रे केली पाठ। चारी वेद मुखी म्हणत।
झाला पंडित विख्यात। नाही तुटे कामिनी संगत।।
दत्ता म्हणे जो ओळखे सद्वस्तुशी। जो जाई झणी गुरूपाशी।
जेणे त्यागिले देहभोगासी। तोची देखे परब्रह्मासी।।
तोचि मोठा रे मोठा। जाण गुरूचा बेटा।।  
        
                          .....डीसिताराम 





शुक्रवार, १० जून, २०११

दत्ता म्हणे

आलो वैखरीच्या गावी। अहं सोहं बोध होई।।
वेगी जाऊ मध्यमात। ध्वनि ऐकु अनाहत।।
जीव शिव ऐक्य झाले। नाद पुढे प्रगटले।।
झाले देवाचे दर्शन। क्षीणदोष झाले मन।।
झणी पश्चंतीच्या गावा। घेऊ घडीचा विसावा।।
ओळखली परावाणी। साऱ्या विश्वाची जननी।।
पाहू सुखाचे सोहळे। नादब्रह्म पांगुळले।।
दत्ता गेला परेपार। स्वये झाला ब्रह्माकार।।


सहस्रदळावरी तेज प्रगटले।
स्वरूपी लावले आत्मत्त्वी।।
आत्मत्त्वपुढे आटले आटले।
ब्रह्मतेज ठाकले कौतुकाने।।
अहंब्रह्म भाव तोही मावळला।
सोहं पांगुळला अळुमाळु।।
दत्ता म्हणे संती ठेवा हा विश्वास।
कौतुके सायास करू नका।।

     .....डीसिताराम












गुरुवार, ९ जून, २०११

दत्ता म्हणे

श्रीरामाचे श्लोक

वंदन करीतो गणेशा पुढती।
आरुढ व्हावे जी बसावे पुढती।।
वीणा हस्तकी वंदीली माय देवी।
जाण बाळक अज्ञानी कृपा व्हावी।।

मी मी करीत गर्वात वाया गेलो।
तू तू करीत स्वरुपी नष्ट झालो।।
धाव अनंता कृपा सर्वदा राहो।
आत्मस्वरुपी मलिन नाश पावो।।

बरा पावला मानव जन्म मना।
उगा सांडशी योगी केशव राणा।।
पाठी रामचंद्र उभा घनःश्याम।
त्याचेनी योगे पावशी सर्व काम।।

हनुमंत ज्याशी पुजी सर्वकाळी।
असा रघुविर स्मरे चंद्रमौळी।।
त्याशी स्मरीता बाणली वृत्ती शान्ति।
जीवा दाटली वास केली विश्रान्ति।।

नाना भोगुनी मानव जन्म झाला।
अहंता क्रोधात उगा शिणवला।।
घेई घेई रे राम नाम मुखाने।
तेणे पाविशी जन्मोजन्मी सुखाने।।

आधी रामनाम मग राम रुप।
त्याच्या स्वरुपी नाही मुळी माप।।
घडोघडी त्याशी स्मरीता स्वभावे।
सदा संकटी कळवळुनी धावे।।

सदा रामधुन मनात वसु दे।
कैवल्य आनंद ह्रदयी वसो दे।।
पाहतो पाहतो राम रघुविर।
राहतो राहतो सारे चराचर।।

नको रे स्मरु गतकाळ शोकाचा।
नाही मानवा भरवसा कशाचा।।
नाशिले आयुष्य नाही काळ वेळ।
सदा स्मरा वेगु भक्त प्रतिपाळ।।

तृषार्त मनी नाम वदत जावे।
सर्व कामना वेगी सांडी स्वभावे।।
दिनानाथ राम आहे एक बाणी।
सदा रक्षी मागे पुढे चक्रपाणी।।

सर्व जिवांचा एक आराम आहे।
करुणाकरा श्रीहरि तोषताहे।।
सदा भक्त रक्षी आघात सोसुनी।
रघुरायाचे पाय स्मरितो मनी।।

सकल जिवांचा करीतो सांभाळ।
तेजस्वी शोभतो वीर घननिळ।।
धर्म रक्षण्या धावी युगानुयुगी।
आत्मतेजस्वी शोभे श्रीमान योगी।।

नको मानवा राघवेविण आशा।
नास्तिक्ये होईल जीवन निराशा।।
उठ सांड वेगी आलस्य प्रमाद।
नको करु उगा कशाचा रे खेद।।

प्रभु रामराजा धावे भक्त काजा।
जीव शीव ऐक्य करी आत्मराजा।।
उन्मनी दाटली खळाळुन आली।
सकल कामला ह्रदयी निमाली।।

राम राम श्वासे रोम रोम बोले।
पाऊली पाऊली हनुमंत डोले।।
गर्जने हुंकारे घेई राम नाम।
असा हनुमंत शोभे पुर्णकाम।।

ज्याचा सखा राम सर्वदा आराम।
आत्मरती रमे पाही घनःश्याम।।
जानकी रमणा भक्तकल्पदृमा।
नमस्कार तुज कोटी कोटी रामा।।

तुझे गुण वर्णिँता जिव्हा थकेना।
पाऊली पाऊली जानकी रमणा।।
नाही आदि मध्य नाही त्याशी अंत।
सदा पाठीराखा उभा बळवंत।।

अरे दुःख भोग कोणाशी टळतो।
जे जे कर्म केले तैसेची भोगतो।।
पहा रे रावणा गर्वे नष्ट झाला।
अकस्मात लंकेसहित बुडाला।।

पित्यासाठी ज्याने वनवास केला।
असा रामचंद्र आदरे पुजीला।।
राक्षसा करुनी खंडण मंडन।
तेजे तळपे राम कैवल्य जाण।।

लक्षुनी पाही रे अंतरी आपणा।
दुर्गुणी भरला काम क्रोध नाना।।
रिक्त करुनिया गुणदोष सारे।
श्रीराम स्थापना वेगेशी करारे।।

राम नाम ध्याता एकरुप झाला।
मनाच्या गाभारा श्रीराम ठसला।।
विश्वस्वप्न वाटे स्थिति आरुढला।
ब्रह्म ऐक्य झाला स्वरुपी निमाला।।

राम नाम घेता कोण वाया गेला।
गर्वे अधांतरी उगाच सांडला।।
स्मरी सिताकांत कौसल्या नंदना।
अति आदरे पुजी वल्लभ राणा।।

रामनामी विश्व मृगजळ वाटे।
तुर्यातितवस्था अंतरी प्रगटे।।
हीच योगियांची ब्रहमानंद टाळी।
सदैव निमग्न राही चंद्रमौळी।।

प्रेमे स्नेहभरे पुजावे तयाशी।
अति आदरे तोषवावे प्रभुशी।।
सख्य जोडता भय लोपले मनी।
चराचरी त्याचा वास राही गुणी।।

चराचरी भक्त एकरुप झाला।
ब्रह्म ऐक्य रसी न्हाऊनी निघाला।।
विश्व त्याचे घर प्रभुचे निवास।
नाही भेद मनी अखंड स्थितीस।।

राम नाम घेता ब्रह्मरुप झाला।
जन्म मरणाचा फेरा चुकविला।।
ब्राह्मी दृढावली जीव शिव ऐक्य।
दृढ मना भासे एकची अनेक।।

जे जे काही एक गतिमान आहे।
ते ते श्रीराम वास करुनी आहे।।
घेई ध्यानी मनी परब्रह्म रुप।
सहज चिंतनी प्रगटे स्वरुप।।

अरे मानवा उठ संदेह सांडी।
रुप सगुण जोडी विकल्प मोडी।।
ज्ञानदृष्टी फाकवी जाणुन घेई।
वसले चैतन्य सर्व भूतां ठाई।।

आहे श्रीराम माझा कोदंडधारी।
काळाते थरारी भक्ता तारी तारी।।
त्याचे गुण गाता जिव्हा थकेना।
नमस्कार माझा तुज नारायणा।।

भटकु नको रे उगा तीर्थ नाना।
पडे बंधनी काम करी ठणाणा।।
स्मरी वेगु मनी भक्त प्रतिपाळा।
सदा संकटी धावे प्रभु कळाळा।।

ठायाची बैसोनी अंतरी लक्षी रे।
प्रभुची स्थापना ह्रदयी करारे।।
स्मरा सिताकांत त्याचे गुण गाता।
नमस्कार तुज कृपाळु अनंता।।

कृपाळु मवाळु स्नेहाळु दयाळु।
प्रभू रघुविर असे घननिळु।।
त्याशी स्मरीता बाणे वैराग्य जीवा।
हसत मुखाने करी ऐक्य शिवा।।

घाल उडी नको पाहू काळ वेळ।
प्रभू रामराजा रक्षी सर्व काळ।।
तया आठविता सख्य वाटे जीवा।
कृपाळु केशवा गोविंद माधवा।।

दत्ता झाला वेडा पायी मिठी केली।
मन पुष्पांजली प्रभुशी वाहिली।।
तेणे तुष्टला रे सखा घनःश्याम।
अति आदरे घडे जीवा आराम।।

         ..... डी सिताराम











 





 








 


















शनिवार, ४ जून, २०११

दत्ता म्हणे

नरदेह तुम्ही जाणा नाशिवंत।
काय ते जाणत, जन्मोनिया।।
खोटा गोतावळा, लटका प्रपंच।
मार्ग धरी साच, जन्म खरा।।
वायाचि फिरशी उघडी तु डोळे।
गपिष्टका न कळे, खुण याची।।
दत्ता म्हणे करा, हिताचा संसार।
वाया घरदार सोडु नका।।
    
              .............डीसिताराम

मंगळवार, ३१ मे, २०११

दत्ता म्हणे

पुत्र. बंधु, कांता, मज भ्रमविती।
भुललो मी चित्ती, विषयांच्या।।
संसाराचे सुख, गोड वाटे जीवा।
भुललो केशवा, नाठवेना।।
विश्वस्वप्न साच, दृढावले मनी।
काढेल यातुनी, कोण मज।।
दत्ता म्हणे माझा, असे भोळा भाव।
सद्गुरु सावेव. धाव घेई।।

                .....डीसिताराम

गुरुवार, २६ मे, २०११

दत्ता म्हणे

नाशिवंत हा संसार।
नाम हेचि जिवा सार।।
आवडिने नाम घ्यावे।
सदा सर्वकाळ ध्यावे।।
हेचि औषध सर्वांशी।।
भवरोग तुडविशी।।
दत्ता म्हणे सार सार।
करी संसारी उद्धार।।

भारवाही मी संतांचा।
बोलतसे त्यांची वाचा।।
मज नसे आत्मज्ञान।
असे हिनाहुनी हीन।।
बाप कौतुके शिकवी।
तेचि लेकुरे वदवी।।
दत्ता शरण संतांशी।
काया अर्पियेली त्याशी।।

काम क्रोध दंभे, छळिताती सारे।
पुढे अहंकारे, माज केला।।
मी-तू पण माझे, संसारी भ्रमलो।
धनापाठी गेलो, वाया जनी।।
विश्वस्वप्न सत्य, दृढ वाटे मना।
चित्त ही वासना, नाशियेली।।
जन्मोजन्मी कर्म, भोग पाठी आले।
मज भ्रमविले, याच जन्मी।।
दत्ता म्हणे जीव, होई कासाविस।
संसाराचा भास, जीव घेई।।

झालो मी आंधळा गा। संसारी भ्रमतांना।।
गात्रे शक्ति हरपली। पुढे मज चालवे ना।।
कोणीतरी हात धरा। मार्ग मज दाखवा ना।
काया ही थकली गा। दुःख भोगितो नाना।।1।।
आंधळ्याशी दया करा। भीक मागितो तुम्हा।
तुम्ही संत मायबाप। द्यावे अभय आम्हा।।धृ।।
विषय सुखे छळती गा। काम वासना भारी।।
क्रोधे मी पंगु झालो। कोण यातुन तारी।।
जन्मभोगे घात केला। आलो दुःखाच्या दारी।।
ज्ञान, ध्यान कोठे गेले। बुद्धि भ्रमियेली भारी।।2।।
साधूसंता निंदा केली। जीव्हा थोर बाटली गा।।
नाही आठवला देव मनी। नाही केले तीर्थाटण गा।।
दानपुण्य करवेना। माय बापा छळले गा।।
विकारांचा दास झालो। चित्त माझे नागवले गा।।3।।
जन्म मृत्यू चक्र थोर। सारे भरडुनी जाती।।
माझे माझे म्हणणारे। कालप्रवाही पडती।।
दुःख भ्रांति पडे जीवा। नाही तयास गति।।
परनिंदे भ्रष्ट झालो। नासे कर्तव्य जगती।।4।।
दत्ता म्हणे जागे व्हारे। प्रभु सोयरा करा।।
नाम मुखी घेऊनिया। जन्म पावन करा।।
पुन्हा नको जन्मभोग। चुकवी येरझारा।।
हाचि जन्म शेवटला। बापा परत फिरा।।5।।

                  .....डीसिताराम

बुधवार, २५ मे, २०११

दत्ता म्हणे

हरि माता हरि पिता।
भवताप हरविता।।
घालु तयावरी भार।
करु प्रेम अनिवार।।
नाही तया मानपान।
प्रेमे घेतो उचलुन।।
दत्ता म्हणे ऐसा हरि।
अंतर्बाह्य वास करी।।

हरि स्मरा हरि स्मरा।
क्लेश जाती दिगंतरा।।
तुटे बंधन काळाचे।
नामघोष करा वाचे।।
अति आदरे पुजावे।
नाम प्रेमे घ्यावे घ्यावे।।
ठेऊ नका लाज मनी।
हरि स्मरा जनीवनी।।
दत्ता सांगतो सर्वांशी।
जाई शरण हरिशी।।

नको नको ज्ञान जळो अभिमान।
सोडी मी तु पण अवगुण।।
शुद्ध भक्ति प्रेम शुद्ध भोळा भाव।
आवडे सदैव ह्रषिकेशा।।
नामसंकीर्तन टाळ वीणा हाती।
संतुष्ट श्रीपती तयालागी।।
दत्ता म्हणे आम्ही प्रभुची लेकरे।
प्रेमाने आदरे स्मरतसे।।

स्थिरावली वृत्ती विठ्ठलाच्या पायी।
कवण्या उपायी नये मागे।।
नासे चित्तभ्रम नासे मी तु पण।
अनुभवे जाण निजवृत्ती।।
शब्द पांगुळले मन हे सरले।
नाही ना उरले अहंभावा।।
दत्ता देखे डोळा मूर्ति विश्वंभर।
पाही चराचर पांडुरंग।।

            .......  डीसिताराम

सोमवार, २३ मे, २०११

दत्ता म्हणे

विश्वरुप हरि, जवळी अंतरी।
राहे चराचरी, कौतुकाने।।
हरि नये दाविता, बोलता सांगता।
परि एक चित्ता अनुभवा।।
शुद्ध प्रेमे करी, सुखाचा विलास।
संसाराचा भास, दुर करी।।
दत्ता म्हणे यांशी, जाणावा सत्वर।
मन हे माघार पहुडले।।

हरिरंगी मन, रंगले रंगले।
हरिशी देखीले, अंतर्बाह्य।।
धाव ही खुंटली, बाहेरी बाहेरी।
हरि नाही दुरी, ह्रदयात।।
मन पांगुळले, विषय अंतरी।
सकल श्रीहरि, व्यापलासे।।
दत्ता भोगतसे, भक्तिचा आनंद।
विठ्ठलाचा छंद, जडे जीवा।।

                ......डीसिताराम

रविवार, २२ मे, २०११

दत्ता म्हणे

खरा देव लुप्त झाला।
भ्रष्टाचार झाला देव।।
भ्रष्टाचारी थोर झाले।
नागविले गरीबांशी।।
पैसा भुखंडाचा ग्रास।
करी वास महालात।।
बॅंका पोट फुगवुनी।
किती मनी माज तया।।
दत्ता म्हणे ऐशा नरा।
ठेचा मारा तुडवुनी।।


कलियुगी नाम जपा।
आहे सोप्याहुनी  सोपा।।
तेणे तुटेल बंधन।
होई काळाचे खंडण।।
थोर संत कीर्ति गाती।
ऐशी नामाची महती।।
दत्ता म्हणे नाम घेऊ।
नाम घेता उगे राहु।।


भक्ति मुक्ति नामापाशी।
प्रेमे स्मरावे हरिशी।।
भव बंधन मोचक।
नाम तारक तारक।।
नामे दोषांचे हरण।
नामे मोक्षाचे भरण।।
दत्ता म्हणे नाम जपा।
तोचि मार्ग आहे सोपा।।

             ...........डीसिताराम



शनिवार, २१ मे, २०११

आश्रम व्यवस्थेचे चार कलंक

1. कर्मत्यागी गृहस्थः- जो गृहस्थ धर्मात राहुन त्यास प्राप्त झालेले कर्म न करता फक्त कालापव्यय करत असेल,
2. व्रतत्यागी ब्रह्मचारीः- जो ब्रह्मचारी असेल, पण ब्रह्मचर्य व्रताचा पालन करत नसेल तर त्याचे ते ढोंगच होय.
3. गावात रहाणारा तपस्वीः- तपस्वी म्हणजे वानप्रस्थात प्रवेश केलेला. असा जो कोणी असेल त्याने गावात राहु नये. जनसंपर्कापासुन दुर रहावे. पण जो गावातच राहुन लोकांच्या संसारात लुडबुड करत असेल तर ते त्याचे ढोंगच होईल.
4. इंद्रियलोलुप संन्यासीः- हल्लीचे बाबा स्वतःला संन्यासी, योगी, अवतारी म्हणवुन घेतात व वासनेच्या अधिन राहुन समाज कार्याचा आव आणतात, कोट्यवधी रुपयांची माया जमवतात. अबलांवर बलात्कार करतात. आव संन्यासाचा पण कर्म मात्र अश्लिलतेचे, अशा बाबा महाराजांना कोणते नाव द्यावे तेच कळत नाही. समाज मात्र यांकडे कसा ओढला जातो, हे मात्र गुढ आहे. बाबांच्या शिष्य संप्रदायात भगिनी वर्गच जास्त आढळुन येतो. हा प्रकार भयावह आहे. समाज मानसिक रोगाने पछाडला जात आहे, हे मात्र खरे आहे. असे ढोंगी बाबा म्हणजे आपल्या समाज व्यवस्थेला लागलेली किडच आहे. ही कीड वेळीच ठेचली नाही तर मात्र आपले काही खरे नाही.

हे चारही आश्रमव्यवस्थेचे कलंक आहेत, आणि व्यर्थ आश्रम आचरणाचा देखावा करणारे मुर्ख आहेत. समाजाने या चारही मुर्खांना हद्दपार केले पाहिजे.

                                                                   .................  डी सिताराम

मनाचा निग्रह

ज्यांस आपल्या मनावर विजय प्राप्त करावययाचा असेल, त्याने आसक्ति व परिग्रहाचा त्याग करुन संन्यासी वृत्ती ठेवावी व एकांतात राहुन त्याने जेवण व निद्रा अल्पशी ( परिमित ) घ्यावी. पवित्र आणि सपाट जमिनीवर आसन टाकुन स्वच्छ मनाने त्यावर बसुन ओमकारचा प्रथम मोठ्याने व नंतर मनातल्या मनात जप करावा. दृष्टी नासिग्रावर ठेऊन पुरक, कुंभक व रेचक द्वारा प्राण आणि अपानाची गति नियंत्रण करावी, मनातल्या चित्तवृत्ती जेथे जेथे जातील तेथ तेथुन विद्वान पुरुषाने त्यावृत्ती खेचुन ह्रदययात थोपवाव्यात. प्रथम असे करणे कठिण जाईल, पण सवयीने ते सहज साध्य होईल. कारण असाध्य ते साध्य, करिता सायास। कारण अभ्यास तुका म्हणे।। असा सतत अभ्यास करीत गेल्याने मनातील वृत्ती या मनातच थांबल्याचा अनुभव येईल. ज्याप्रमाणे इंधन संपल्यावर अग्नि आपोआपच विझुन जातो, त्याचप्रमाणे थोड्याच वेळात चित्त हे शान्त होऊन जाते. अशाप्रकारे मनातल्या वृत्ती या जेव्हा अत्यंत शान्त होतात, त्यावेळेला चित्त ब्रह्मानंदात विलिन होते अणि मग चित्तवृत्ती या परत उसळत नाहीत. असा साधक संसारातील सुख-दुःखाने विचलीत होत नाही. तो सदा आनंदी रहातो. कारण सर्व अनर्थाचे मुळ हे आपले मनच होय. या मनाच्या चंचलतेमुळे आपण संकटात सापडतो व आजचा आनंद हरवुन बसतो. करीता मनावर विजय प्राप्त करणे अपरिहार्य ठरते. त्यासाठी वरील साधना प्रत्येकाला सहजच करण्याजोगी आहे. पाहिजे फक्त मनाचा निश्चय.

                                    ......... डी सिताराम

शनिवार, १४ मे, २०११

हे लक्षात ठेवा

8शिष्यास अनुग्रह दिल्यावर सद्गुरु शिष्यांची वेळोवेळी चौकशी करतात. त्यांच्यात नामाबद्दल गोडी उत्पन्न करतात. नाम दिल्यानंतर जो अनुभव येतो त्या अनुभवाच्या वरच्या अवस्थेत नेण्यास शिष्यांस उत्तेजन देतात. शिष्यांची खरोखर उन्नती होते आहे की नाही, यावर त्यांचा भारी कटाक्ष असतो.
8खरे सद्गुरु हे शिष्यांस भक्तियोग, ज्ञानयोग व कर्मयोगाची सांगड कशी घालावी हे शिकवतात. तसेच त्यांना स्वधर्म समजाऊन सांगतात.
8खरे सद्गुरु हे शिष्यांना अंधश्रद्धेपासुन दूर ठेवतात.
8खरे सद्गुरु शिष्यांस ज्ञान देऊन प्रबोध देतात व त्यांना विश्वस्वप्नातुन जागे करतात. आत्मदर्शन घडवुन आणतात.
8खरा शिष्य गुरुंनी दिलेले नाम मोठ्या श्रद्धेने घेतो.
8खरा शिष्य हा गुरुंचा आदर करतो व मनात आलेले सर्व संशय गुरुंजवळ मनमोकळेपणाने सांगुन शंका निरसन करुन घेतो.
8खरा शिष्य हा गुरुंनी सांगितलेल्या ज्ञानाचे चिंतन करुन प्रयत्नाने ज्ञानात भर घालतो. ज्ञानेश्वरी, अमृतानुभव, चांगदेव पासष्टी, योगवाशिष्ठ, दासबोध, उपनिषदे व महाभारत यांसारख्या पवित्र ग्रंथाचे नियमित वाचन व मनन करतो.
8प्राप्त झालेला अनुभव गुरु किंवा अधिकारी व्यक्तिंखेरीज कोणाला सांगु नये.
8बद्धतेकडुन मोक्षाकडे, सगुणत्वाकडुन निर्गुणत्वाकडे वाटचाल करायची असल्यामुळे शिष्याने नामसाधना अत्यंत सुक्ष्मत्वाने करावी. तसेच गुरुंच्या देहाकडे न पाहता गुरुंचे विश्वव्यापक रुपाकडे लक्ष ठेऊन ज्ञानसाधना चालु ठेवावी. 
 
8एकवेळ गुरुंचा विसर पडला तरी चालेल पण त्यांनी जी साधना व जे नाम दिलेले आहे कोठल्याही परिस्थितीत सोडु नये.
8गुरुंची महती एकदा समजल्यावर त्यांच्यावर दृढ विश्वास ठेवा व त्यांच्या कार्यास हातभार लावावा. त्यांचे विचार तळागाळातील सर्वस्तरीय बांधवांपर्यंत पोचविण्याचे पवित्र कार्य करा.

8नवा व बलवान भारत घडवा.
8संतांच्या चमत्कारांकडे लाक्षणिक अर्थाने पाहा. त्या चमत्कारात गुंग होऊ नका,

8स्वतः स्वधर्म आचरुन दाखवा तसेच दुसऱ्यांनाही आचरण्यास सांगा.
8कोणावरही अन्याय करु नका व कोणाचाही अन्याय सहन करु नका तसेच अहिंसेचा अतिरेक करु नका.

8प्राचिन काळातील ऋषी-मुनींच्या तत्वज्ञानाचा अर्थ वैज्ञानिक दृष्टीकोनातुन समजुन घ्या व तसे वागण्याचा प्रयत्न करा. 
8अंधश्रद्धा मनी कवटाळुन ठेऊ नका. डोळस व्हा.

8स्रियांना मान देण्यास शिका. ज्या घरात वा ज्या देशात स्रियांना योग्य मान दिला जातो, तेथे स्वधर्म, नीति, संपत्ती व खरा परमार्थ वास करीत असतो हे लक्षात ठेवा.
8जेथे स्रियांना उपभोग्य वस्तु म्हणुन बघितले जाते तेथे अज्ञान, अविद्या, अधर्म व अवदसा वास करतात. असा विकारी जनांचा अधःपात हा ठरलेलाच असतो. असा व्यक्ति कधीच सुखी नसतात हे लक्षात ठेवावे.

8सवड काढुन पंढरपुर, आळंदी, शिर्डी, गाणगापुर यासारखी पवित्र तीर्थयात्रा करा. आपल्या श्रीमंतीचे प्रदर्शन करु नका. साधा व भोळा भावच ईश्वराला आवडतो. 
8थोर पुरुषांची भेटीगाठी घ्या. त्यांचा आशीर्वाद घ्या. संतांची अभंगे पाठ करा.

8एकादशी नियमित करा. जमेंल तर आरत्या, हरिपाठ नियमित म्हणण्याचा परिपाठ चालु करा. नियमांचे पालन करा. नियम अंगी बाणा. लहान मुलांना शुभ संस्कार देऊन घडवा. 
8घर अंगण परिसर स्वच्छ ठेवा.
8दारु, तंबाखु, मद्यपान, मांसाहार, परद्रव्य व परदारा यांपासुन दूर राहा. कोठलेही व्यसन करु नका.
8दुसऱ्या बांधवांनाही अध्यात्माचा मार्ग दाखवा. त्यांनाही अनुग्रह घ्यायला सांगुन परमार्थावर वाटचाल करायला सांगा.

8चमत्कार व बुवाबाजीवर विश्वास ठेऊ नका.

8ज्ञानी व्यक्तिंचा सहवास करा.

8भगवंताचे वेळोवेळी स्मरण करीत चला. जेंव्हा जेंव्हा तुमचे मन संसारातील गोष्टींकडे भरकटत जाईल तेंव्हा तेंव्हा त्यास प्रयत्नपुर्वक खेचुन भगवंताकडे लावा. हळुहळु सवय झाल्यावर ते आणखी कशातही गुंतणार नाही.

8परस्री व परधन यापासुन जाणिवपुर्वक दूर राहा.

8वेळोवेळी गुरुंचा सहारा घ्या. त्यांच्या मार्गदर्शनाप्रमाणे वाटचाल करा. भक्तिमार्ग सोपा व सरळ आहे. कोणालाही कोणत्याही वयात तो सहज करण्याजोगा आहे. पण तो मार्ग गुरुंकडून नीट समजुन घ्या. कारण शुद्ध मार्ग फक्त सदुगुरुच सांगु शकतील.

8सतत गुरुंवर अवलंबुन राहु नका. त्यामुळे परावलंबी होण्याची शक्यता जास्तच. स्वतः विवेकाने व ज्ञानपुर्वक वागल्यास वैराग्य व भक्ति ही दृढ होत जाते व तीच खरी गुरुसेवा होय.

8स्वतःचे निर्णय स्वतः घ्या.

8तुमचे मन जसजसे अध्यात्मात प्रगत होऊ लागेल तसतसे विकार उसळुन तुमचा मनक्षोभ होईल. अशा वेळी धीर व संयम ठेवा. इंद्रियांच्या आहारी न जाता तटस्थ भावाने व साक्षित्वाने स्वतःचे परिक्षण करा.

8जग हे परिवर्तनशिल आहे, पण म्हणुन संसार हा अर्धवट सोडु नका. आपल्या वाट्याला जे भोग प्राप्त झालेले आहेत ते निमुटपणे स्विकारा.

8वेळोवेळी ध्यान करा. त्याचबरोबर स्वतःचेहि परिक्षण करा. आपल्या चुका ओळखुन त्यावर मात करा.

8खरा साधु निसर्ग नियमात ढवळाढवळ करत नाही. तो निसर्गाने आखुन दिलेल्या चौकटीत आनंदाने रहातो.

8रंजल्या गांजल्यात ईश्वर पहा. समाजातील तळागाळातील बंधुंची  जमेल तितकी निस्वार्थी भावनेने सेवा करावी.

8खरा साधू ओळखुन त्याची भक्तिभावाने पूजा करावी. तसेच शत्रु ओळखुन त्याला वेळीच ठेचण्याचे वा प्रतिकार करण्याचे धारिष्ठ दाखवावे. दास्यत्व ईश्वराचे स्विकारावे. स्वतःच्या स्वार्थासाठी उठसुठ कोणाचे पाय धरु नये.

8उठा...... वेळ थोडा आहे. कार्य जास्त आहे. यश तुमचेच आहे. सद्गुरु सदैव तुमचे रक्षण करोत. तुमची अध्यात्मिक प्रगती होवो व स्वधर्मावरील वाटचाल ही सुखकर होवो. तुमचे मंगल होवो

                                             ......डी सिताराम